Film Review ‘THAR’: रेगिस्तान जैसी सूखी और मैली है फिल्म ‘थार’

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Film Review ‘THAR’: हमारे देश में विदेशों से प्रभावित होकर फिल्में बनाना कोई नई बात नहीं है. अमेरिका में काऊबॉय यानी चरवाहों की जिंदगी पर बनी फिल्में जिन्हें “वेस्टर्न” कहा जाता है, 100 साल से भी ज़्यादा समय से बनाई जाती रही हैं. वेस्टर्न फिल्मों का इतिहास बहुत पुराना है और अब उस तरह की पृष्ठभूमि, विकास की वजह से कुर्बान हो चुकी है, यदि अब उस बैकग्राउंड पर फिल्म बनती है तो उसे नीयो वेस्टर्न माना जाता है. काऊबॉय या वेस्टर्न फिल्मों में एक श्वेत शख्स को दिखाया जाता था जो घुड़सवार था, बन्दूक और रिवॉल्वर चलाता, बड़ी सी हैट और ऊंचे एंकल वाले जूते पहनकर किसी मेक्सिकन या दक्षिण अमेरिकी कसबे में पहुंच जाता था. लूटमार कर वर्चस्व के लिए गांव के बाहुबली से भिड़ जाता था और अंत में सबको मारकर गांव की गोरी को उठाकर अपने साथ ले जाता था.

गांव की कहानी हमारे देश में भी तकरीबन ऐसी ही रहती है और ज़मींदारों के खिलाफ कोई एक परदेसी जांबाज़ आकर गांव की रक्षा करता था. अगर ठीक से याद करें तो भारत की सबसे सफल फिल्म शोले भी एक वेस्टर्न अंदाज़ की ही फिल्म थी. इसी कड़ी में चाइना गेट, मेरा गांव मेरा देश, खोटे सिक्के, यतीम, बंटवारा, गुलामी और ढेरों इसी अंदाज़ की फिल्में बनायीं गयी हैं. भारत में इस शैली की फिल्में अधिकांश राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनायीं गयी हैं या फिर कुछ फिल्में चम्बल के बीहड़ या उत्तर प्रदेश के गांवों में बसी हैं. राजस्थान में मरुस्थल, गरीबी और ज़मींदार-राजा-महाराजा अभी भी मिल जाते हैं तो इस अंदाज़ की फिल्में अभी भी बनायीं जा सकती है.

एक लंबे अर्से के बाद ‘थार’ नाम की एक फिल्म हाल ही में नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ की गयी है जो नीयो-वेस्टर्न शैली की भारतीय फिल्म है. राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके थार में हिंदुस्तान-पाकिस्तान की सरहद पर एक गांव जहां बड़ी दूर-दूर बने कच्चे घर हैं, एक पुलिस थाना है, बस स्टैंड और एक ढाबा, और कई सालों से उसी थाने के थानेदार के तौर पर काम करता इंस्पेक्टर सुरेखा सिंह (अनिल कपूर) है. पूरा इलाका रेगिस्तान है, लोग अपनी बकरियां चराने गांव के बाहर तक जाते हैं और कुछ लोग गांव के बाहर जाकर मजदूरी करते हैं. एक दिन एक शहरी बाबू सिद्धार्थ (हर्षवर्धन कपूर) आता है, कुछ लोगों को शहर में काम के लिए ले जाता है और उनमें से एक की पत्नी (फातिमा सना शेख) के साथ सम्बन्ध बना लेता है.

जैसे-जैसे रेगिस्तान की धूल उड़ती है, पता चलता है कि ये शहरी बाबू इन लोगों को टॉर्चर कर के किले में लटका कर मार रहा है. पुलिस पीछे पड़ती है, लेकिन बीच में आ जाते हैं अफीम के तस्कर जो पुलिस वालों पर गोलियां बरसा देते हैं. जैसे तैसे बचकर अनिल कपूर किले तक पहुंचता है. हर्षवर्धन तब तलक फातिमा के साथ गांव से फरार होकर उसी किले में होते हैं. अनिल, हर्षवर्धन से सरेंडर करने के लिए कहते हैं, लेकिन तीन क़त्ल कर चुके हर्षवर्धन को फातिमा अपने पति की हत्या करने के लिए गोली मार देती है. फ्लैशबैक में हर्षवर्धन की क़त्ल करने की वजह दिखाई जाती है.

बदले की कहानी है और बलात्कार के बदले में हत्या की असलियत है. कुछ नया नहीं है लेकिन इस फिल्म में सबसे खूंखार है इसका कैमरा. श्रेया देव दुबे ने रेगिस्तान के उड़ती हुई धूल से लेकर अंधेरे किले में टॉर्चर के दृश्य बहुत ही वीभत्स तरीके से फिल्माए हैं. हर्षवर्धन से तो नहीं, लेकिन टॉर्चर होते हुए देखकर अपने आप ही डर सा लगने लगता है. सुदूर रेगिस्तान के एक कोने में एक मरे हुए भैंसे की लाश (हिंदुस्तानी तो लग नहीं रहा था) भी एक अजीब माहौल पैदा करती है. वहशीपन में जब बाल्टी में भूखा चूहा रखकर बाल्टी छाती पर बांध दी जाती है, या तेज़ खंजर से कान काट लिए जाते हैं, कुल्हाड़ी से छाती चीर दी जाती है तो जुगुप्सा नहीं, डर लगता है.

हर दृश्य में और भयावह माहौल पैदा करने के लिए अजय जयंती का संगीत भी जोड़ीदार है. उभरते हुए संगीतकार अजय ने वायलिन की मदद से एक भूतिया मसान का माहौल तैयार किया है. आने वाले समय में अजय से काफी उम्मीदें हैं. अनिल कपूर का काम जोरदार है. 25 साल तक एक ही थाने में, वो भी बॉर्डर पर बसे रेगिस्तान के एक थाने में इंस्पेक्टर की हैसियत से काम करते रहना और अपने वरिष्ठ अधिकारी की महत्वकांक्षा के सामने सर झुकाने वाले पुलिसवाले का रोल अनिल कपूर ने कमाल का किया है. पत्नी से प्रेम भरी झिड़कियां खाते, अपने प्रिय मातहत भूरे (सतीश कौशिक) के साथ उनकी ट्यूनिंग अद्भुत है. हर्षवर्धन अपने पिता के पासंग भी नहीं हैं.

उनकी आंखों में अभी खौफ पैदा करने वाली भावना ने जन्म नहीं लिया है. सुख सुविधापूर्ण माहौल में पले बढ़े हर्षवर्धन को अभी अभावों का कोई अनुभव नहीं है. संभव है उनके रिफरेन्स प्वाइंट भी कमज़ोर हों. हर्षवर्धन से कतई डर नहीं लगता. न ही वो फातिमा के साथ रोमांटिक रोल ठीक से कर पाते हैं, क्योंकि उनकी आंखों में हवस भी बड़ी ही सोफिस्टिकेटेड सी है. उन्हें शहर के आदमी का किरदार निभाना चाहिए. इस रोल के लिए उन्हें और इंतज़ार करना चाहिए था. फातिमा सना शेख का रोल ठीक है. उनके बांझ होने के बिंदु को बड़ी ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया है और क्लाइमेक्स में भी उनका शॉट अत्यंत महत्वपूर्ण है.

सतीश कौशिक चैंपियन हैं, इसलिए छोटे से रोल में भी छाप छोड़ने में माहिर हैं. बाकी कलाकार अपने अपने रोल में ठीक हैं, कोई एक चरित्र उभर के नहीं आता. कहानी की डिमांड भी कुछ ऐसी ही है. निर्देशक राज सिंह चौधरी को अभिनय करते हुए सभी ने देखा है. अनुराग कश्यप की फिल्म गुलाल में उन्होंने दिलीप सिंह मीणा की मुख्य भूमिका अदा की थी. थार उनकी दूसरी निर्देशित फिल्म है इसके पहले वो शादीस्थान नाम की एक कॉमेडी निर्देशित कर चुके हैं जो डिज्नी हॉटस्टार पर पिछले साल रिलीज़ हुई थी. अच्छी फिल्म थी लेकिन ज़्यादा चर्चा में नहीं आयी. राज ने अनुराग कश्यप के साथ कुछ फिल्में लिखी भी हैं जैसे नो स्मोकिंग और गुलाल. किस्सा ये भी है कि राज सिंह को अनुराग ने लिखने का या अभिनय करने का कोई पैसा नहीं दिया तो अनुराग इस फिल्म में राज के साथ बतौर लेखक जुड़े और स्क्रीनप्ले लिखने में मदद की.

अनुराग ने पिछले साल एके वर्सस एके नाम की नेटफ्लिक्स फिल्म में अनिल और हर्षवर्धन के साथ काम किया हुआ है तो उनकी रेंज का अंदाजा अनुराग को पहले से ही था. एडिटिंग के लिए महा-भरोसेमंद आरती बजाज को लिया है जिन्होंने अनुराग, इम्तिआज़ अली, तिग्मांशु धूलिया और इन्हीं की मण्डली के राज कुमार गुप्ता के लगभग सभी फिल्में एडिट की हैं. फिल्म इसलिए धीमी रफ़्तार के बावजूद एकदम कसी हुई है. अगर हिंसा से डरते हैं या स्क्रीन पर वीभत्स दृश्य नहीं देखना चाहते तो “थार” के रेगिस्तान का सफर तो मत ही करिये लेकिन अगर अनुराग कश्यप की फिल्मों से तबीयत बहलती है तो मान के चलिए राज सिंह चौधरी भी जोड़ के निर्देशक हैं और इसलिए थार जरूर देखिये.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Anil kapoor, Harshvardhan Kapoor



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